Sunday, July 17, 2011

जीवन के चिरकालिक पथ पर

जीवन के चिरकालिक पथ पर पग बढ़ाते
चलते बढ़ते गतिक गंतव्य की और
देता पीछे से पुकार कोई, लेता उसका दामन थाम
झकझोर देता अपने सशक्त प्रयत्न से
कहता उसको हिलाते डुलाते
"हे अनवरत पथिक, हे निर्मम पथिक
हे मौजी हे दीवाने
मैं तुम्हारी सह पथिक
मैं तुम्हारी जीवन की स्मृतिया....."

पथिक वो जो चला था हाथी सी चाल सा...
पथिक वो जो चला था धरा नापने
करता अचानक अनुभव पाँव में अपने बेड़ीओ का
बेड़ीया बेड़ीया हाय बेड़ीया
"मेरा जीवन मेरा पथ मेरा लक्ष्य मेरा गंतव्य
है सब कुछ अब ये बेड़ीया"
चंचल व्याकुल भौंचक्का विस्मित
नीले अम्बर पर श्याम मेघ की भाति
मुख पर छाते भाव हज़ार
वृक्षों की निर्मल छाया
होती प्रतीत ओझल होती
कहराता चिल्लाता रोता सुबकता
असहाय मुख से निकलते ये ही वचन
"दे दो मुक्ति मुझे, मेरी जीवन की बेड़ीया "
"दे दो मुक्ति मुझे...."

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