नया पथ, नयी शंकाए, नयी दिशायें, नए डर....
नया पथ... करता नेर्दिशेत एक नयी मंजिल की ओर...
नयी मंजिल... नया गंतव्य.. नए लक्ष्य...नए उद्देश्य....
नूतन पथ... ओढ़े चादर सुबह की ओस की ....
देता नीमंतरण अपनी ओर ...
आयों मेरे इस निष्कलंक आवरण को...
अपने पग से मैला करो ....
ओर मैं... देखता उसकी ओर लिए आँखों में शंकाए...
नए पथ की नयी शंकाए...नए उलझने... नयी चुनोतियाँ ...
मन में देता भय दस्तक ....
प्रवाह करती होती अनुभव ...
एक सनसनी मेरे शरीर के भीतर ...
देती मुझे अवसर प्रदान ताकि कर सकु मैं अन्तरावलोकन....
देख सकु मैं कुछ देर रुक कर...
खुद अपने ही अपने मन के भीतर ...
लिए अपने गर्भ में छिपाए नयी दिशाएं... ये शंकाए...
नयी दिशाएं....
कितनी प्रलोभक... कितनी आकर्षक...
अप्सरा सी मोहक... हिरनी सी चंचल....
स्वर्णपदक सी लुभावनी... सागर सी अथाह...
पर्वत सी उची.... नदिया सी अविरूद्ध...
हीरे जैसी सुबोध...
देती मुझे प्रलोभ ये नयी दिशाएं....
बाँध मुठी चल पड़ता मैं ...नए पथ पर , नए पथ पर ....