Thursday, November 3, 2011

तेरे लिए दिल हारा, तेरे ऊपर दिल हारा

तेरे लिए दिल हारा, तेरे ऊपर दिल हारा
तेरे मुखड़े पर दिल हारा, तेरे योवन पर दिल हारा

तूने इस दिल को अपना बनाया
तुने इस दिल को प्यार सिखाया
तुने इस दिल को हसना सिखाया
तुने अनजाने में कभी कभी दिल को रुलाया
इस सब में तू कितना हँसा कितना रोया
एय मेरे दिलबर मैं कभी न जाना
तुने दिल को म्यूजिक सिखाया
तुने मुझे कवी बनाया
तुने मुझे नींद से जगाया
तुने दर्द का मतलब सिखाया
तुने ख़ुशी का अंदाज़ सिखाया
तुने अँधेरे में छुपा मोती दिखाया
तुने मेरी दुनिया में प्यार जगाया ....

तुने मुझे पिंकू लेकिन अब तक अपना न बनाया ....

Wednesday, October 19, 2011

Pinku Pnku Pinku ....

पिंकू पिंकू पिंकू
मेरा बर्फ भी तू, मेरी गर्मी भी तू
मेरा सजदा भी तू , मेरा जुर्म भी तू
पिंकू मेरी जणू तू
मेरा इल्म तू
मेरा रब भी तू , मेरा शैतान भी तू ...
पिंकू तेरे साथ ये दिल रना चिअदा ....
पिंकू तेरे मु से दिल हा सुनन चिअदा ....
पिंकू पिंकू पिंकू मेरा जान भी तू
मेरा लाल भी तू मरता पीला भी तू
मेरा काला भी तू , मेरा श्वेता भी तू ....
मेरा दिन भी तू मेरी रात भी तू ...
मेरी सर्दी भी तू , मेरी गर्मी भी तू ...
मेरा जयपुर भी तू , मेरा शिमला भी तू ....

पिंकू पिंकू मेरा जानू है तू ....

Tuesday, September 27, 2011

Makes me startled....

Dense Hair, Long Hair, Black Hair, Shining Hair ...
Makes me startled her hair...

Kohl Eyes, deep eyes, clear eyes, tranquil eyes,
Makes me feel calm her eyes...

Smartly Dressed, soberly dressed, nicely dresses
Takes my breath away her dressing sense

Subtle charm, seductive charm, penetrating charm..
A charm that makes this world look calm...

Sweet voice, soothing voice, koel like voice,
Listening to her voice , you have no other choice

Pious Composure, gentle composure, composed composure
Her composure gives everything shady a closure...

Sunday, September 18, 2011

मनोहारी, मुग्धा ,सलोनी, कमनीय एक लड़की

मनोहारी, मुग्धा ,सलोनी, कमनीय एक लड़की
जिसका सौन्दर्य करता वशीभूत, करता सम्मोहित
लावन्य लुभाता, करता मंत्रमुग्ध
मोहित, अधीन, मूर्छित शायद
करता महसूस, करता अनुभव खुद को मैं बंदी ....
बंदी उसके नैनो का, बंदी उसकी मुस्कान का

आनंदित, प्रफ्फुलित, हर्षित, प्रसंचित
अधीन लेकिन उसके लावन्य का
धन्य, संपन्न, समृद्ध, विपुल
करता महसूस, करता अनुभव खुद को मैं बंदी ....
बंदी उसके नैनो का, बंदी उसकी मुस्कान का

स्वर्णिम, सुनहरा , सुनहला रूप उसका, यौवन उसका
चारू व्यक्तित्व, तीक्ष्ण मोहरा , गोरा वर्ण, चंचल चितवन
बातें जिसकी करती जादू, देती अनुभव खुशगवार
लुभाती, ललचाती, करती आकर्शित .....
मनोहारी, मुग्धा ,सलोनी, कमनीय एक लड़की

Wednesday, August 10, 2011

प्रतीक्षा... एक नए आरम्भ की ...

नया पथ, नयी शंकाए, नयी दिशायें, नए डर....


नया पथ... करता नेर्दिशेत एक नयी मंजिल की ओर...
नयी मंजिल... नया गंतव्य.. नए लक्ष्य...नए उद्देश्य....
नूतन पथ... ओढ़े चादर सुबह की ओस की ....
देता नीमंतरण अपनी ओर ...
आयों मेरे इस निष्कलंक आवरण को...
अपने पग से मैला करो ....

ओर मैं... देखता उसकी ओर लिए आँखों में शंकाए...
नए पथ की नयी शंकाए...नए उलझने... नयी चुनोतियाँ ...
मन में देता भय दस्तक ....
प्रवाह करती होती अनुभव ...
एक सनसनी मेरे शरीर के भीतर ...
देती मुझे अवसर प्रदान ताकि कर सकु मैं अन्तरावलोकन....
देख सकु मैं कुछ देर रुक कर...
खुद अपने ही अपने मन के भीतर ...

लिए अपने गर्भ में छिपाए नयी दिशाएं... ये शंकाए...

नयी दिशाएं....
कितनी प्रलोभक... कितनी आकर्षक...
अप्सरा सी मोहक... हिरनी सी चंचल....
स्वर्णपदक सी लुभावनी... सागर सी अथाह...
पर्वत सी उची.... नदिया सी अविरूद्ध...
हीरे जैसी सुबोध...

देती मुझे प्रलोभ ये नयी दिशाएं....

बाँध मुठी चल पड़ता मैं ...नए पथ पर , नए पथ पर ....

Sunday, July 17, 2011

जीवन के चिरकालिक पथ पर

जीवन के चिरकालिक पथ पर पग बढ़ाते
चलते बढ़ते गतिक गंतव्य की और
देता पीछे से पुकार कोई, लेता उसका दामन थाम
झकझोर देता अपने सशक्त प्रयत्न से
कहता उसको हिलाते डुलाते
"हे अनवरत पथिक, हे निर्मम पथिक
हे मौजी हे दीवाने
मैं तुम्हारी सह पथिक
मैं तुम्हारी जीवन की स्मृतिया....."

पथिक वो जो चला था हाथी सी चाल सा...
पथिक वो जो चला था धरा नापने
करता अचानक अनुभव पाँव में अपने बेड़ीओ का
बेड़ीया बेड़ीया हाय बेड़ीया
"मेरा जीवन मेरा पथ मेरा लक्ष्य मेरा गंतव्य
है सब कुछ अब ये बेड़ीया"
चंचल व्याकुल भौंचक्का विस्मित
नीले अम्बर पर श्याम मेघ की भाति
मुख पर छाते भाव हज़ार
वृक्षों की निर्मल छाया
होती प्रतीत ओझल होती
कहराता चिल्लाता रोता सुबकता
असहाय मुख से निकलते ये ही वचन
"दे दो मुक्ति मुझे, मेरी जीवन की बेड़ीया "
"दे दो मुक्ति मुझे...."

Sunday, July 10, 2011

मेरे जीवन की निर्मल छाया






मेरे जीवन की निर्मल छाया,
होती प्रतीत दो वृक्षों के तले

दो वृक्ष जिन्होंने दिया पोषण दो नन्ही पोधो को
दो नन्ही पौधे पनपी, बढ़ी, फैली, आगे बढ़ी
लकिन जब भी देखा उन्होंने सर उठा कर
पाई ऊपर निर्मल छाया
मेरे जीवन की निर्मल छाया

उन पोधो को दिया आसरा जगत के तूफानों में
जब भी आया झोका तेज़ हवा का फैलाई शाखाएं 
लिया समां अपनी शाखायों के मध्य
और मिली उन पोधो को असीम सुरक्षा
मेरे जीवन की निर्मल छाया

तीस साल के अटूट बंधन, तीस साल के संघर्षमय जीवन,
तीस साल के प्रबल उद्योग, तीस साल के चुनौतिपूरण जीवन  के पश्चात् 
आज वो वृक्ष जीवन के गोधुली पर है निश्चिंत, स्थिर, शांत, अव्याकुल
जब भी होते वो नन्ही पौधे व्याकुल, फैलाते अपने शाखाये
देते सहारा अपने मजबूत तने का , देते अहसास उन पोधो को
हम है तुम्हारे जीवन की निर्मल छाया
मेरे जीवन की निर्मल की छाया